यशराज फिल्म्स का स्पाई यूनिवर्स पिछले एक दशक में हिन्दी सिनेमा का सबसे सफल फ्रेंचाइज़ मॉडल बनकर उभरा है। एक था टाइगर से शुरू हुआ यह सफर टाइगर ज़िंदा है, वॉर और पठान जैसी फिल्मों तक पहुँचते-पहुँचते एक ऐसे सिनेमाई संसार में बदल गया, जहाँ दर्शक केवल कहानी देखने नहीं जाते, बल्कि बड़े कैनवास, रोमांचकारी एक्शन, करिश्माई नायकों और तकनीकी भव्यता का अनुभव करने पहुँचते हैं। ऐसे में अल्फा से उम्मीदें असाधारण थीं। यह केवल स्पाई यूनिवर्स की अगली कड़ी नहीं थी, बल्कि हिन्दी सिनेमा की पहली बड़े बजट वाली महिला-केंद्रित जासूसी फिल्म के रूप में प्रस्तुत की गई थी। आलिया भट्ट और शारवरी जैसी प्रतिभाशाली अभिनेत्रियाँ, यशराज का विशाल प्रोडक्शन, अंतरराष्ट्रीय लोकेशन और व्यापक प्रचार। कागज़ पर सब कुछ ऐसा था कि यह फिल्म एक नए दौर की शुरुआत करती हुई दिखाई दे रही थी। दुर्भाग्य से पर्दे पर पहुँचते ही यह चमक धीरे-धीरे फीकी पड़ने लगती है।
अल्फा की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी कहानी नहीं, बल्कि उसकी पटकथा है। जासूसी फिल्मों में कहानी अक्सर बहुत जटिल नहीं होती, लेकिन उनकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वे दर्शकों को किस तरह रोमांच, रहस्य और भावनात्मक जुड़ाव के साथ बाँधकर रखती हैं। अल्फा इसी परीक्षा में असफल हो जाती है। अनाथ बचपन, गुप्त प्रशिक्षण, एक खतरनाक मिशन, अंतरराष्ट्रीय साजिश, विश्वासघात और अंतिम मुकाबला। यह सब कुछ हमने न जाने कितनी बार देखा है। फिल्म किसी भी मोड़ पर ऐसा आश्चर्य नहीं पैदा करती जो दर्शक को अपनी सीट से बांधे रख सके। अधिकांश घटनाएँ पहले से अनुमानित लगती हैं और कथानक में वह जिज्ञासा कभी पैदा ही नहीं होती जो एक सफल स्पाई थ्रिलर की पहचान होती है।
यह कमी और अधिक स्पष्ट तब दिखाई देती है जब हम इसकी तुलना उसी शैली की सफल फिल्मों से करते हैं। हॉलीवुड में Mission: Impossible श्रृंखला ने यह साबित किया है कि शानदार एक्शन के साथ भावनात्मक गहराई भी संभव है। John Wick ने साधारण बदले की कहानी को अपने अनूठे विश्व-निर्माण और सटीक एक्शन के कारण एक सांस्कृतिक घटना बना दिया। Atomic Blonde ने महिला जासूस की छवि को न केवल शक्तिशाली, बल्कि मानसिक रूप से जटिल और मानवीय भी बनाया। हिन्दी सिनेमा में वॉर ने अपनी पटकथा में रहस्य और रोमांच का संतुलन बनाए रखा, जबकि पठान ने अपनी अतिनाटकीयता को मनोरंजन का हिस्सा बना दिया। अल्फा इन सभी फिल्मों से प्रेरणा तो लेती है, लेकिन अपनी अलग पहचान नहीं बना पाती।
आलिया भट्ट इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत भी हैं और सबसे बड़ी विडम्बना भी। अभिनय के स्तर पर उनकी प्रतिभा पर कोई प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जा सकता। राज़ी, गंगूबाई काठियावाड़ी, हाईवे और उड़ता पंजाब जैसी फिल्मों में उन्होंने बार-बार सिद्ध किया है कि वे भावनात्मक जटिलताओं को बेहद सहजता से पर्दे पर उतार सकती हैं। उनकी सबसे बड़ी शक्ति उनकी आँखें, उनके चेहरे के सूक्ष्म भाव और उनके भीतर की संवेदनशीलता है। अल्फा इन गुणों का लगभग कोई उपयोग नहीं करती। पूरी फिल्म उन्हें लगातार दौड़ते, गोली चलाते, लड़ते और मिशन पूरा करते हुए दिखाती है। उन्होंने इस भूमिका के लिए शारीरिक मेहनत निस्संदेह की है, लेकिन केवल प्रशिक्षण किसी अभिनेता को एक विश्वसनीय एक्शन स्टार नहीं बना देता। स्क्रीन पर एक ऐसी आभा चाहिए जो दर्शक को विश्वास दिलाए कि यह पात्र वास्तव में भय पैदा कर सकता है। आलिया ईमानदार दिखाई देती हैं, लेकिन भयावह नहीं।
यह उनकी असफलता नहीं, बल्कि फिल्म की चरित्र-रचना की असफलता है।
शारवरी फिल्म की सुखद उपलब्धियों में से एक है। उनमें ऊर्जा है, फुर्ती है और एक्शन दृश्यों में सहजता भी दिखाई देती है। कई स्थानों पर वे आलिया से अधिक स्वाभाविक लगती हैं। दुर्भाग्य यह है कि पटकथा उन्हें विकसित होने का अवसर ही नहीं देती। शुरुआत में जिस समान साझेदारी का संकेत मिलता है, धीरे-धीरे वह एक पारंपरिक नायक-सहयोगी संबंध में बदल जाती है। जिस फिल्म का प्रचार दो महिला जासूसों की बराबरी की कहानी के रूप में किया गया था, वही अंत तक पहुँचते-पहुँचते पुराने बॉलीवुड ढाँचे में लौट आती है।
बॉबी देओल के साथ भी लगभग यही समस्या है। Animal के बाद दर्शकों को उनसे एक प्रभावशाली खलनायक की उम्मीद थी। उनके व्यक्तित्व में वह गंभीरता और रहस्य है जो किसी बड़े प्रतिपक्षी को यादगार बना सकते हैं। लेकिन अल्फा उन्हें केवल एक सामान्य खलनायक बनाकर छोड़ देती है। उनके उद्देश्य सतही हैं, संवाद साधारण हैं और नायक के सामने उनकी चुनौती कभी वास्तविक नहीं लगती। यादगार स्पाई फिल्मों में खलनायक उतना ही महत्वपूर्ण होता है जितना नायक। यहाँ यह संतुलन पूरी तरह गायब है।
निर्देशक शिव रवैल ने The Railway Men में संवेदनशील निर्देशन का परिचय दिया था। वहाँ मानवीय भावनाएँ और घटनाओं की गंभीरता उनकी सबसे बड़ी शक्ति थीं। अल्फा में वे बड़े पैमाने के एक्शन सिनेमा की लय पकड़ने में संघर्ष करते दिखाई देते हैं। फिल्म का संपादन असमान है। जहाँ गति तेज होनी चाहिए, वहाँ दृश्य अनावश्यक रूप से लंबे खिंचते हैं। जहाँ पात्रों को साँस लेने का समय मिलना चाहिए, वहाँ फिल्म जल्दबाज़ी में अगले एक्शन दृश्य की ओर भाग जाती है। परिणामस्वरूप दर्शक न तो पात्रों से भावनात्मक रूप से जुड़ पाता है और न ही लगातार चल रहे एक्शन से रोमांचित हो पाता है।
एक्शन दृश्यों की बात करें तो यही वह क्षेत्र था जहाँ अल्फा सबसे अधिक चमक सकती थी। दुर्भाग्य से यहाँ भी फिल्म औसत स्तर से ऊपर नहीं उठती। लड़ाई के अधिकांश दृश्य अत्यधिक तेज़ कट्स और हिलते हुए कैमरे पर निर्भर हैं। आज जब दर्शक John Wick, Extraction, The Raid और Mission: Impossible जैसी फिल्मों का एक्शन देख चुके हैं, तब केवल तेज़ संपादन प्रभाव पैदा नहीं करता है। दर्शक अब स्पष्ट कोरियोग्राफी और वास्तविक शारीरिक प्रदर्शन देखना चाहते हैं। वॉर की कई लड़ाइयाँ आज भी याद रहती हैं। पठान के बड़े एक्शन सेट-पीस चर्चा का विषय बने। अल्फा का कोई भी दृश्य उस स्तर की स्मृति नहीं छोड़ता।
तकनीकी दृष्टि से फिल्म भव्य है। यशराज फिल्म्स ने लोकेशनों, प्रोडक्शन डिज़ाइन, वेशभूषा और छायांकन पर भरपूर खर्च किया है। हर फ्रेम महँगा दिखाई देता है। अंतरराष्ट्रीय लोकेशन आकर्षक हैं और दृश्यात्मक स्तर पर फिल्म किसी भी तरह सस्ती नहीं लगती। लेकिन यही इसकी सबसे बड़ी विडम्बना भी है। करोड़ों रुपये पर्दे पर दिखाई देते हैं, परंतु भावनाएँ नहीं।
पृष्ठभूमि संगीत अपना काम करता है, लेकिन याद नहीं रह जाता। किसी भी सफल स्पाई फ्रेंचाइज़ की अपनी एक संगीत पहचान होती है। जेम्स बॉन्ड का थीम हो, Mission: Impossible की धुन हो या पठान का संगीत, वे फिल्म समाप्त होने के बाद भी दर्शकों के साथ चलते हैं। अल्फा इस स्तर का कोई श्रव्य अनुभव नहीं दे पाती।
संवाद भी फिल्म की कमजोर कड़ी हैं। कई स्थानों पर वे इतने सामान्य और पूर्वानुमेय हैं कि पात्रों के व्यक्तित्व को उभारने के बजाय उन्हें और सपाट बना देते हैं। एक सफल जासूसी फिल्म केवल गोलीबारी से नहीं बनती। वह बुद्धिमत्ता, मनोवैज्ञानिक टकराव और तीखे संवादों से बनती है। यहाँ इन तीनों की कमी साफ दिखाई देती है।
सबसे अधिक निराशा इस बात से होती है कि फिल्म महिला-केंद्रित एक्शन सिनेमा की संभावनाओं को पूरी तरह नहीं समझ पाती। केवल पुरुष नायक की जगह महिला नायिका रख देने से कोई फिल्म स्वतः प्रगतिशील नहीं हो जाती। Kill Bill में प्रतिशोध की तीव्रता थी। Atomic Blonde में मनोवैज्ञानिक जटिलता थी। The Hunger Games में कैटनिस एक्शन हीरो बनने से पहले एक विचार बन चुकी थी। स्वयं आलिया भट्ट ने राज़ी में बिना बड़े एक्शन के भी एक यादगार जासूस का चरित्र रचा था। अल्फा इन अनुभवों से बहुत कम सीखती हुई दिखाई देती है।
फिर भी फिल्म को पूरी तरह खारिज कर देना उचित नहीं होगा। आलिया भट्ट की मेहनत हर दृश्य में दिखाई देती है। शारवरी ने यह साबित किया है कि वे भविष्य में बड़े एक्शन प्रोजेक्ट्स की मजबूत दावेदार हो सकती हैं। तकनीकी स्तर पर फिल्म कई बार प्रभावित करती है और यशराज फिल्म्स का पैमाना अब भी हिन्दी सिनेमा में अलग दिखाई देता है। समस्या केवल इतनी है कि इन सबके बीच सबसे आवश्यक तत्व, एक प्रभावशाली पटकथा, कहीं खो गया है।
अंततः, अल्फा एक बुरी फिल्म नहीं, बल्कि एक अधूरी फिल्म है। इसमें क्षमता है, संसाधन हैं, प्रतिभाशाली कलाकार हैं और बड़े सपने भी हैं। जो नहीं है, वह है एक ऐसी कहानी जो इन सबको अर्थ दे सके। यह फिल्म इस बात का प्रमाण है कि किसी भी सिनेमाई ब्रह्मांड की सबसे मजबूत नींव उसके सितारे या उसका बजट नहीं, बल्कि उसकी पटकथा होती है। यदि यशराज स्पाई यूनिवर्स को लंबे समय तक प्रासंगिक बनाए रखना चाहता है, तो उसे अगली बार अपने ब्रह्मांड के विस्तार से अधिक अपने पात्रों और उनकी कहानियों पर ध्यान देना होगा।
रेटिंग: 2.5/5
अल्फा उस तरह की फिल्म है जिसे देखकर अफसोस अधिक होता है, गुस्सा कम। क्योंकि इसमें असफलता प्रतिभा की नहीं, बल्कि कल्पना और लेखन की है।
Movies Desk